बाबा का शृंगार करने के बाद जो आनंद पुजारी जी महंत जी को आया होगा वह भी दर्शन के साथ हम भक्तजन पाते हैं। जीवन चक्र में वर्ष तो कालावधि है जो चंद्र सूर्य पृथ्वी आकाश के सापेक्ष है आनंद तो हमारा स्वभाव है जो हमसे स्वयं के कारण ही लुप्त हो जाता है। उस माया रूपी आवरण से प्रच्छन्न आनंद रूपी स्वभाव को प्राप्त करने के लिए दैनंदिन स्मरण दैनिक साप्ताहिक दर्शन सामाजिक एक्य यही तो हमारी मंदिर परंपरा है। उस आनंद अहोभाव के साथ सामाजिक दायित्व का निर्वहन हमारी दान दक्षिणा संकुचित भावों में जब से फंसी है तो हमारा पतन भी हुआ है। इस पतन से निकलने के लिए वैयक्तिक सामाजिक राष्ट्रीय प्रयासों की शृंखला का आरंभ स्वयं से करें। अपने निर्मल स्वभाव को दर्शन से स्व तक पहुंचने के लिए कृत संकल्प हों। यह दास्य भाव की शक्ति ही हनुमान कहलाती है। और हमारे बाबा तो भाव के साथ ही जागृत हो जाते हैं। चैत्र शुक्ल पूर्णिमा हनुमान जयंती की सभी स्वजनों को शुभकामनाएं प्रणाम।